“लोकतंत्र में नेता को पार्टी के पीछे मत छिपाइए; उसे जनता के सामने अकेला खड़ा कीजिए। जब नेता पार्टी का नहीं, जनता का दबाव महसूस करेगा, तब जवाबदेही अपने आप पैदा होगी।”
15 अगस्त केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का उत्सव नहीं है। यह उस लोकतंत्र पर भी विचार करने का दिन है, जिसे हमने स्वतंत्र भारत में अपने लिए चुना।
आज एक सवाल मेरे मन में लगातार उठता है—क्या लोकतंत्र में राजनीतिक दल आवश्यक हैं, या हमने राजनीतिक दलों को लोकतंत्र का पर्याय मान लिया है?
मेरा प्रस्ताव सरल है, लेकिन इसका असर बहुत बड़ा हो सकता है।
राजनीतिक पार्टी बनाने की अनुमति ही क्यों हो?
उम्मीदवार स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ें। प्रत्येक उम्मीदवार चुनाव के समय अपनी विचारधारा, अपना उद्देश्य और अपना कार्यक्रम जनता के सामने स्पष्ट करे। चुनाव चिह्न अलग-अलग हों, ताकि मतदाता व्यक्ति की पहचान आसानी से कर सके। जनता जिसे योग्य समझे, उसे चुने।
फिर चुने हुए प्रतिनिधि संसद या विधानसभा में पहुँचें।
अब जिन प्रतिनिधियों की विचारधारा और उद्देश्य समान हों, वे सदन के भीतर एक समूह बनाएँ। बहुमत वाला समूह सरकार बनाए और उसी समूह के निर्वाचित प्रतिनिधि अपने बीच से प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का चुनाव करें। बाकी निर्वाचित प्रतिनिधि विपक्ष की भूमिका निभाएँ।
यानी आज की व्यवस्था में जो काम राजनीतिक दल चुनाव से पहले करते हैं, वही काम इस व्यवस्था में निर्वाचित प्रतिनिधि चुनाव के बाद करेंगे।
अंतर केवल इतना होगा कि पहले जनता किसी पार्टी और उसके घोषित नेता के प्रभाव में वोट देती है; इस व्यवस्था में जनता पहले व्यक्ति को चुनेगी और उसके बाद वही व्यक्ति सदन में अपने समान विचार वाले प्रतिनिधियों के साथ सरकार बनाएगा।
नेता को पार्टी के पीछे क्यों छिपाया जाए?
मेरे विचार में लोकतंत्र की सबसे बड़ी समस्या केवल भ्रष्टाचार नहीं है। समस्या यह भी है कि राजनीतिक दल कई बार नेता के लिए एक सुरक्षा-कवच बन जाते हैं।
नेता के पीछे पार्टी होती है।
पार्टी के पीछे संगठन होता है।
संगठन के पीछे कार्यकर्ता होते हैं।
और फिर व्यक्तिगत जवाबदेही धीरे-धीरे सामूहिक जवाबदेही में बदल जाती है।
नेता जनता से कह सकता है—“पार्टी का निर्णय है।”
लेकिन लोकतंत्र में अंतिम जवाबदेही किसके प्रति होनी चाहिए?
पार्टी के प्रति या जनता के प्रति?
मेरा उत्तर स्पष्ट है—जनता के प्रति।
इसलिए मेरा मूल सिद्धांत है:
नेता को पार्टी के पीछे मत छिपाइए, उसे जनता के सामने अकेला खड़ा कीजिए।
जब नेता को अपने चुनाव क्षेत्र की जनता के सामने अपने हर निर्णय का जवाब देना होगा, तब जनता का दबाव स्वयं काम करेगा।
समान विचारधारा वाले लोग फिर सरकार कैसे बनाएँगे?
यह प्रश्न स्वाभाविक है।
इसका उत्तर भी बहुत सरल है।
हर उम्मीदवार चुनाव के समय अपनी विचारधारा और अपना कार्यक्रम जनता के सामने घोषित करेगा। जिन लोगों का उद्देश्य और राजनीतिक दृष्टिकोण समान होगा, वे स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे के साथ आएँगे।
आज भी तो ऐसा ही होता है।
चुनाव के बाद कई दल गठबंधन करते हैं और सरकार बनाते हैं।
अंतर केवल इतना होगा कि इस व्यवस्था में गठबंधन किसी स्थायी राजनीतिक पार्टी के माध्यम से नहीं, बल्कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से बनेगा।
मान लीजिए किसी विधानसभा में 200 प्रतिनिधि चुने गए।
120 प्रतिनिधियों की विचारधारा और कार्यक्रम समान हैं। वे साथ आकर सरकार बनाएँगे।
बाकी 80 प्रतिनिधि विपक्ष में होंगे।
सरकार के भीतर से ही प्रतिनिधि अपने प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का चुनाव करेंगे।
इसमें असंभव क्या है?
जनता ने सभी को चुना है। सरकार भी वही बनाएँगे जिन्हें जनता ने चुना है। विपक्ष भी वही होगा जिसे जनता ने चुना है।
पार्टी केवल बीच से हट जाएगी।
फिर गुटबाजी का क्या होगा?
गुटबाजी को समाप्त करना संभव नहीं है।
मनुष्य विचारों में अलग होंगे तो समूह बनेंगे ही।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या उस समूह को एक स्थायी राजनीतिक पार्टी, स्थायी संगठन, स्थायी फंड और स्थायी नेतृत्व के रूप में जनता के ऊपर बैठा देना आवश्यक है?
मेरे विचार में नहीं।
समान विचार वाले लोग सदन में आएँ, समूह बनाएँ, सरकार बनाएँ और पाँच वर्ष तक अपने कार्यक्रम के अनुसार काम करें।
पाँच वर्ष पूरे हुए।
फिर चुनाव।
फिर जनता नए प्रतिनिधि चुनेगी।
फिर नए समूह बनेंगे।
अर्थात् राजनीतिक समूह जनता से ऊपर स्थायी सत्ता-संरचना नहीं, बल्कि सदन के भीतर बनने वाली अस्थायी राजनीतिक व्यवस्था होंगे।
चुनावी पूँजीवाद पर भी चोट
इस व्यवस्था का एक और संभावित लाभ है—राजनीतिक फंडिंग।
आज राजनीतिक दल स्थायी संस्थाएँ हैं। उन्हें लगातार धन चाहिए। चुनाव चाहिए, संगठन चाहिए, प्रचार चाहिए और वर्षों तक राजनीतिक गतिविधियाँ चलानी होती हैं।
जब राजनीतिक पार्टी ही स्थायी संस्था नहीं होगी, तो स्थायी पार्टी फंड का प्रश्न भी बहुत हद तक समाप्त हो सकता है।
किसी उम्मीदवार को कोई व्यक्ति या संस्था आर्थिक सहायता देती है तो उस धन का स्रोत स्पष्ट और सार्वजनिक होना चाहिए। आवश्यकता पड़े तो आयकर विभाग और निर्वाचन व्यवस्था यह देख सकती है कि पैसा कहाँ से आया, किसे दिया गया और किस उद्देश्य से खर्च हुआ।
राजनीति में पैसा छिपाने की जगह पैसा दिखाना होगा।
इससे चुनावी पूँजीवाद पर नियंत्रण की एक नई संभावना पैदा हो सकती है।
क्या इससे लोकतंत्र अधिक व्यक्तिगत हो जाएगा?
हाँ।
और यही तो उद्देश्य है।
आज राजनीति बहुत हद तक party-centric है।
मैं इसे representative-centric democracy बनाना चाहता हूँ।
अर्थात्—
पार्टी नहीं, प्रतिनिधि।
पार्टी का आदेश नहीं, जनता का जनादेश।
पार्टी की जवाबदेही नहीं, व्यक्ति की जवाबदेही।
यदि कोई प्रतिनिधि सरकार में है और अपने समूह के निर्णय से असहमत है, तो वह अपनी असहमति सार्वजनिक रूप से रख सके। यदि वह सरकार का हिस्सा नहीं रहना चाहता, तो वह सरकार से अलग हो सके।
लेकिन जनता को यह साफ दिखाई देगा कि कौन किस निर्णय के पक्ष में था और कौन विरोध में।
व्यक्ति के निर्णय का रिकॉर्ड रहेगा।
अगले चुनाव में जनता तय करेगी कि उसे वही व्यक्ति फिर चाहिए या नहीं।
यहीं वास्तविक राजनीतिक जवाबदेही शुरू होती है।
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री कौन बनाएगा?
इसका उत्तर भी सरल है।
जनता प्रतिनिधियों को चुनेगी।
फिर चुने हुए प्रतिनिधि अपने बीच से प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री चुनेंगे।
अर्थात् जनता पहले प्रतिनिधि चुनेगी और प्रतिनिधि सदन के भीतर सरकार का नेतृत्व चुनेंगे।
आज भी मूल संसदीय व्यवस्था में यही सिद्धांत है, अंतर केवल इतना है कि राजनीतिक दल पहले से यह तय करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं कि नेतृत्व कौन करेगा।
इस प्रस्ताव में उस निर्णय की शक्ति निर्वाचित सदन के भीतर वापस लाई जाएगी।
विपक्ष कौन होगा?
जिसे सरकार में बहुमत नहीं मिला, वह विपक्ष होगा।
इसके लिए अलग से कोई पार्टी बनाना आवश्यक नहीं।
सरकार एक समूह होगी।
बाकी प्रतिनिधि जनता की ओर से प्रश्न पूछेंगे, सरकार के निर्णयों की समीक्षा करेंगे और जनता की आवाज़ सदन में रखेंगे।
यानी—
सरकार और विपक्ष दोनों जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों से ही बनेंगे।
स्वतंत्रता दिवस पर यह सवाल क्यों?
क्योंकि स्वतंत्रता केवल विदेशी शासन से मुक्ति का नाम नहीं है।
स्वतंत्रता का अर्थ यह भी है कि नागरिक अपने लोकतंत्र को बेहतर बनाने के बारे में सोच सके।
हमने अंग्रेज़ों से सत्ता वापस ली।
फिर संविधान बनाया।
फिर लोकतांत्रिक संस्थाएँ बनाईं।
लेकिन लोकतंत्र कोई अंतिम और स्थिर व्यवस्था नहीं है। समय के साथ उसकी कमियों पर सवाल उठाना भी लोकतंत्र की ही आत्मा है।
इसलिए मेरा प्रश्न किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं है।
यह सवाल व्यवस्था के बारे में है।
क्या जनता ने प्रतिनिधि चुना है या पार्टी?
क्या सांसद/विधायक जनता के प्रति जवाबदेह है या पार्टी नेतृत्व के प्रति?
क्या प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री का वास्तविक राजनीतिक आधार जनता द्वारा चुना गया सदन होना चाहिए या चुनाव से पहले बनी पार्टी संरचना?
और क्या लोकतंत्र को बचाने के लिए हमें राजनीतिक दलों की शक्ति कम करके निर्वाचित व्यक्ति की जवाबदेही बढ़ाने पर विचार नहीं करना चाहिए?
मेरा प्रस्ताव
मैं यह नहीं कहता कि यह व्यवस्था पूर्ण है।
मैं यह भी नहीं कहता कि इसे लागू करना आसान होगा।
लेकिन लोकतंत्र में किसी विचार को इसलिए समाप्त नहीं किया जा सकता कि उसे लागू करना कठिन है।
मेरे लिए इसका मूल सिद्धांत बहुत सरल है:
नेता को पार्टी के पीछे मत छिपाइए।
नेता को जनता के सामने अकेला खड़ा कीजिए।
जब नेता को पता होगा कि उसके पास कोई पार्टी-कवच नहीं है, कोई स्थायी हाईकमान नहीं है और अगले चुनाव में उसे उसी जनता के पास जाकर अपने काम का हिसाब देना है, तब शायद लोकतंत्र में जवाबदेही अपने आप मजबूत होगी।
पार्टी खत्म करने का उद्देश्य राजनीति खत्म करना नहीं है।
उद्देश्य केवल इतना है कि—
राजनीति का केंद्र पार्टी नहीं, जनता द्वारा चुना गया प्रतिनिधि बने।
शायद स्वतंत्र भारत के अगले चरण की सबसे बड़ी संवैधानिक बहस यही हो सकती है:
क्या हम दल-केंद्रित लोकतंत्र से प्रतिनिधि-केंद्रित लोकतंत्र की ओर जा सकते हैं?
स्वतंत्रता दिवस पर यह सवाल केवल मेरा नहीं—हर उस नागरिक का होना चाहिए जो लोकतंत्र को केवल बचाना नहीं, बल्कि लगातार बेहतर बनाना चाहता है।
जय हिंद।
