अगर आज के युग में या यू कहें इस कलयुग में अगर कर्मयोगी की खोज करता हु तो, अभी के समय मे मेरी नजर एक ही व्यक्ति पर ठहरती है,
सब कुछ तो पहले से ही था इसके पास आज सडक पर खड़ा होकर किसके लिए मेहनत कर रहा है ? हर गावँ तक पहुचकर उनके घर बार में रहकर लोगो की तकलीफ समझना, UN में रहकर अरमानी के सूट को पहनने के बाद, कुर्ता पाजामा धारण करके धुल भड़ी सडको से गुजरना पैदल चलना, साथ में कोई ना बंकर है , ना ही कोई काराबाइन, बस पथिक की तरह वो चलता ही जा रहा है।
हालांकि मेरी निजी राय मेरे इस लेख से ठीक उल्ट है,
बहराल मेरी निजी राय पर मै फिर कभी आऊंगा आज जो माहौल बन रहा है और जब दूर तक देखता हु तो उस व्यक्तित्व के आस पास भी फटकता हुआ मुझे कोई दूसरा व्यक्ति नही मिलता।
कुछ लोग मिले, मगर जब उनपर रिसर्च की तब पता चला अरे ये तो भगौरे हैं, कभी टेम्पू में सपथ लेने जाते लोग आज गाडियों के काफिले से निकलते हैं ! और भी रिसर्च किया तब कुछ और बाते भी सामने आई बहरहाल मै लौटता हु आज के कर्मयोगी पर यानी की प्रशांत किशोर पर तो प्रशांत आजकल टेंट में सोते हैं या यु कहे रात गुजारते हैं , हर गाव गाव में वो घूम रहें हैं और अपने अभियान जन सुराज के माध्यम से लोगो को जगाने का काम कर रहें हैं ऐसा वो कहते है।
कर्मयोग की छवि तो दिखती है उनमे मगर कुछ चीजे मुझे खटकती भी है जो की फिर कभी आज के लिए आज के युग का कर्मयोगी प्रशांत किशोर।
अगर आपकी नजर में भी कोई ऐसा व्यक्ति है जो ऐसा कुछ कर रहा है तो मुझे अपडेट कीजियेगा तब तक आप रिसर्च कीजिये हम आते हैं पान खाकर
