पटना, 3 सितंबर। भारत अपनी महान ज्ञान-परंपरा के कारण ही विश्वगुरु रहा है। यह वह देश है, जिसने ज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन के क्षेत्र में पूरी दुनिया का मार्गदर्शन किया। विश्वविद्यालय की अवधारणा भी भारत की देन रही है। शिक्षक ही छात्र-छात्राओं को गढ़ते हैं और उन्हें समाज का मूल्यवान नागरिक बनाते हैं। नया समाज गढ़ने वाले ऐसे आदरणीय शिक्षकों का सम्मान वस्तुतः भारत की महान परंपरा और संस्कृति का सम्मान है। चरित्रवान और गुणी शिक्षक ही चरित्रवान एवं गुणवान नागरिक तैयार कर सकते हैं।
ये बातें गुरुवार को पटनासिटी की सांस्कृतिक संस्था ‘नई दिशा परिवार’ के तत्वावधान में महेंद्रू स्थित राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान के सभागार में आयोजित शिक्षक सम्मान समारोह का उद्घाटन करते हुए बिहार के कला एवं संस्कृति मंत्री प्रमोद कुमार ने कहीं। उन्होंने कहा कि यदि परमहंस रामकृष्ण न होते, तो नरेंद्र स्वामी विवेकानंद नहीं बनते। इसी प्रकार, यदि चाणक्य न होते तो चंद्रगुप्त भी नहीं होते। युवाओं की जिज्ञासाओं को शांत करने और उनका मार्गदर्शन करने का महान दायित्व शिक्षकों का है।
समारोह के मुख्य अतिथि और सिक्किम के पूर्व राज्यपाल गंगा प्रसाद ने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2047 तक जिस विश्वगुरु भारत का सपना देखा है, उसे साकार करने का दायित्व शिक्षक ही पूरा कर सकते हैं।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ ने कहा कि भारतीय संस्कृति में ज्ञान-परंपरा ‘गुरु-ज्ञान’ पर आधारित है। शिक्षा विशाल परिसरों में बने बड़े-बड़े भवनों, दीवारों अथवा वातानुकूलित कक्षाओं से नहीं, बल्कि योग्य और निष्ठावान आचार्यों से प्राप्त होती है। आज शैक्षणिक केंद्रों को पांच सितारा होटल जैसा बनाने के प्रयास हो रहे हैं, जहां व्यवसाय तो हो सकता है, लेकिन संस्कार देने वाली शिक्षा नहीं मिल सकती।
उन्होंने कहा कि इसी कारण आज के विद्यार्थी ‘मनुष्य’ बनने के बजाय ‘धन-मशीन’ बनते जा रहे हैं। शिक्षक होना संसार में कुछ भी होने से बड़ा है, यहां तक कि किसी देश का राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री होने से भी बड़ा। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के पैर छूकर प्रणाम उनके परिजन अथवा वे लोग करते हैं, जिन्हें उनसे किसी प्रकार के लाभ की अपेक्षा होती है। लेकिन शिक्षक के पैर छूकर प्रणाम राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी करते हैं। शिक्षकों को यह स्मरण रखना होगा कि वे देश के भविष्य के निर्माता हैं।
समारोह में पटना विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. के. सी. सिन्हा, पटना की महापौर सीता साहू, सुप्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. दिवाकर तेजस्वी, शिव प्रसाद मोदी और कमल नयन श्रीवास्तव ने भी अपने विचार व्यक्त किए। अतिथियों का स्वागत संस्था के संरक्षक राजेश वल्लभ यादव ने किया, जबकि मंच का संचालन संस्था के सचिव राजेश राज ने किया।
31 शिक्षकों को किया गया सम्मानित
इस अवसर पर बिहार के 31 शिक्षकों को विभिन्न सम्मान से सम्मानित किया गया। सम्मानित शिक्षकों में प्रो. डॉ. रमाकर झा को ‘बिहार विशेष शिक्षा सेवा सम्मान’ प्रदान किया गया।
‘बिहार शिक्षा-रत्न सम्मान’ से प्रो. एन. एस. मौर्य, प्रो. एस. एस. मिश्रा, प्रो. कामिनी सिन्हा, उमेश सिंह, कुमार देवांशु, श्री अरविंद, परितोष कुमार, मनोज कुमार, मिलिंद महिपाल, रजनीश सिन्हा, उर्मिला कुमारी, विष्णु कुमार साह, आकाश जैन, मुकेश कुमार वर्मा, कुमार पंकज सिन्हा, गायत्री देवी, डॉ. अंजलि शर्मा, डॉ. अनुश्री बर्मन, दीपक कुमार, आदित्य कुमार, राकेश कुमार और प्रेम कुमार को सम्मानित किया गया।
‘बिहार गौरव सम्मान’ से डॉ. मुख्तार सिंह, डॉ. सत्येंद्र शर्मा, प्रो. सुधा सिन्हा, डॉ. कुमार अभिनव और अजीत सिंह को सम्मानित किया गया।
वहीं उज्ज्वल राज, युवराज राज और अमृता कुमारी को ‘बिहार प्रतिभा सम्मान’ तथा गायिका मासूम सिंह को ‘बिहार कला-रत्न सम्मान’ प्रदान किया गया।
राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान के पूर्व प्राध्यापक प्रो. संतोष कुमार को ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। वहीं समाजसेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए डॉ. प्रेम कुमार और अभिषेक श्रीवास्तव को भी सम्मानित किया गया।
समारोह में महान शिक्षक एवं भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के योगदान को भी स्मरण किया गया और शिक्षक दिवस के अवसर पर उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया गया।
