कहानी भागीरथी नदी के तट पर गृद्धकूट नाम की छोटी सी पहाड़ी की थी जहाँ जरदगव नाम का एक पुराना गिद्ध रहता था। बूढ़ा हो जाने के कारण जरदगव की दृष्टि कमजोर हो गई थी। उसी वृक्ष पर रहने वाले दूसरे पक्षी उसे मित्र ही मानते थे और अपने लाये भोजन में से थोड़ा बहुत उसे दे दिया। बदले में गिद्ध पक्षियों के बाहर जाने पर उनके बच्चे की देखभाल-सुरक्षा करते हैं, उन पर नजर रखता है। एक दिन के पेड़ पर ढेर सारी फाइलों के बच्चे को दीर्घकर्ण नाम का एक बिल्ला मिला। हंटर बिल्ले को देखा ही रैप्टर्स के बच्चों ने शोर मचाया और गिद्ध का ध्यान बिल्ले पर गया। वो देखने में अक्षम था, लेकिन उसने चुनौती दी! कौन आता है? परिचय दो या मरने को तैयार हो जाओ! गिद्ध पुराना जरूर था, लेकिन उस लड़ाई का नतीजा दीर्घकर्ण था। उसने कॉमरेडों के रूप में भेष बदला, आवाज भी दी कर ली! बड़े प्यार से बोला, मैं गंगा किनारे चंद्रायण व्रत का पालन करता हूं। ब्रह्मचारियों की तरह शाकाहारी भी हूँ। यहाँ से आते हैं रैप्टर के मुख से आपकी प्रशंसा सूनी तो आपसे नीति-धर्म की बातें सीखने लगी हैं। रहने की थोड़ी सी जगह मांगते और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जपते दीर्घकर्ण बिल्ले पर अंतिम गिद्ध ने विश्वास किया। बिल्ला वहीँ पेड़ के नीचे एक कोटर में रहने लगा। उसी दिन जब आस पास की गारंटी थोड़ी सी हो तो बिल्ले ने अपना रंग दिखाया शुरू की। वो चुपके से चोरी के जाने के बाद किसी एक चूजे को मार कर खा जाता है। खाने के बाद बची हड्डियाँ वो गिद्ध की कोटर के पास छोड़ती हैं। वैसे ही लगे हुए दिन में जैसे ही फिल्टर को लगने कि रोज एक-दो बच्चे गायब हो रहे हैं तो वे आस-पास घूमने लगे। खतरा भांपते ही दीर्घकर्ण बिल्ला तो वहां से खिसक गया और चूहे को गिद्ध के कोटर के पास हड्डियों का ढेर मिल गया। उन्होंने सोचा कि निश्चित रूप से गिद्ध ने ही हमारे बच्चों को खा लिया है और क्रुद्ध पक्षी ने मिलकर गिद्ध को मार गिराया। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ पर गारंटी करने वाले गिद्ध की इस भाँती का अंत हुआ।
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भारतीय नेतृत्व के शिखर सुर ऐसे ही वाक्यों से बने हुए हैं।
शानदार व्याख्या👏👏👏
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