लेखक: Aware News 24 डेस्क
झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) में लंबे समय से खाली पड़े अध्यक्ष और सदस्यों के पदों को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को स्पष्ट समयसीमा दे दी है। कोर्ट ने सरकार को दो महीने के भीतर JPSC के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है।
मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ गुरुवार, 11 सितंबर 2026 को JPSC में अध्यक्ष और सदस्यों की अनुपस्थिति को लेकर स्वतः संज्ञान से शुरू की गई याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
18 नवंबर तक देनी होगी रिपोर्ट
सुनवाई के दौरान राज्य के महाधिवक्ता रोहिताश्य रॉय ने अदालत को बताया कि JPSC अध्यक्ष के पद पर नियुक्ति की प्रक्रिया जल्द पूरी होने वाली है।
इसके बाद हाईकोर्ट ने महाधिवक्ता को 18 नवंबर तक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।
मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर को होगी।
JPSC खाली, भर्ती प्रक्रिया पर असर
JPSC में अध्यक्ष और सदस्यों के पद लंबे समय से खाली होने का सीधा असर सरकारी विभागों में नई नियुक्तियों पर पड़ रहा है।
अदालत के सामने यह मामला उस समय आया, जब वन विभाग में अधिकारियों और कर्मचारियों की कमी से जुड़ी याचिका पर सुनवाई हो रही थी। इसी दौरान कोर्ट को जानकारी मिली कि JPSC के महत्वपूर्ण पद रिक्त हैं।
हाईकोर्ट ने पहले ही कहा था कि JPSC एक संवैधानिक संस्था है और अध्यक्ष का पद लंबे समय तक खाली नहीं छोड़ा जा सकता।
क्या है JPSC विवाद की पृष्ठभूमि?
JPSC में मौजूदा संकट के पीछे भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर हुए विवाद की भी बड़ी भूमिका रही है।
पूर्व JPSC अध्यक्ष एल. खियांगते को 10 अगस्त को गिरफ्तार किया गया था। इसके एक दिन पहले आयोग के तीनों सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया था।
तीनों सदस्यों—अजीता भट्टाचार्य, अनीमा हांसदा और जमाल अहमद—के इस्तीफे को राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने स्वीकार कर लिया था।
पेपर लीक के आरोपों ने बढ़ाई मुश्किल
JPSC के खिलाफ अभ्यर्थियों के विरोध प्रदर्शन के बीच CID ने आयोग के तीनों सदस्यों को पूछताछ के लिए बुलाया था।
आरोपों में भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक जैसे गंभीर आरोप भी शामिल थे।
इसी विवाद के बीच आयोग के तीनों सदस्यों के इस्तीफे और बाद में पूर्व अध्यक्ष की गिरफ्तारी ने JPSC की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
विश्लेषण: नियुक्ति से ज्यादा जरूरी है JPSC पर भरोसा बहाल करना
हाईकोर्ट की समयसीमा केवल खाली पद भरने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा सवाल सरकारी भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता का भी है।
1. खाली पद और भर्ती का संकट
JPSC जैसे संवैधानिक आयोग में नेतृत्व का अभाव केवल प्रशासनिक समस्या नहीं है।
👉 इसका असर सीधे उन हजारों युवाओं पर पड़ता है जो सरकारी नौकरियों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं।
2. कोर्ट की सख्ती क्यों महत्वपूर्ण है?
हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि संवैधानिक संस्था को लंबे समय तक नेतृत्वविहीन नहीं रखा जा सकता।
अब सरकार के सामने सिर्फ नियुक्ति करने की चुनौती नहीं है, बल्कि समयसीमा के भीतर पूरी प्रक्रिया को विश्वसनीय तरीके से पूरा करने की चुनौती भी है।
3. असली परीक्षा नई नियुक्तियों के बाद होगी
नए अध्यक्ष और सदस्य नियुक्त हो जाने के बाद भी सबसे बड़ा सवाल रहेगा—
क्या JPSC अपनी परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रिया में अभ्यर्थियों का भरोसा वापस हासिल कर पाएगा?
क्योंकि भर्ती आयोग की विश्वसनीयता केवल पदाधिकारियों की नियुक्ति से नहीं, बल्कि पारदर्शी परीक्षा, निष्पक्ष चयन और समय पर परिणाम से बनती है।
निष्कर्ष: 18 नवंबर अब अहम तारीख
झारखंड हाईकोर्ट ने सरकार के सामने समयसीमा तय कर दी है।
अब नजर रहेगी—
- JPSC अध्यक्ष की नियुक्ति कब होती है?
- सदस्यों के खाली पद कब भरे जाते हैं?
- क्या भर्ती प्रक्रिया फिर गति पकड़ती है?
- और कथित अनियमितताओं के बाद अभ्यर्थियों का भरोसा कैसे लौटता है?
18 नवंबर को सरकार की अनुपालन रिपोर्ट इन सवालों की दिशा तय कर सकती है।
