परिवार केवल साथ रहने की व्यवस्था नहीं है, वह मन, संस्कार, संवेदना और समझ का साझा संसार भी है। जब इस संसार में समरसता होती है, तब घर सचमुच घर बनता है; और जब रिश्तों में भेद, नियंत्रण, अपेक्षा और अहंकार प्रवेश कर जाते हैं, तब वही घर तनाव, मौन और टकराव का मैदान बन जाता है। आज के समय में पारिवारिक जीवन का एक बड़ा प्रश्न यही है कि आखिर घरों में शांति और अपनापन क्यों घटता जा रहा है, और विशेष रूप से सास-बहू, पति-पत्नी तथा विवाह संस्था के भीतर इतनी बेचैनी क्यों बढ़ रही है।
अक्सर देखा जाता है कि कई घरों में सास वही व्यवहार अपनी बहू के साथ दोहराती है, जो कभी उसकी अपनी सास ने उसके साथ किया था। जैसे पीड़ा एक परंपरा बन गई हो। यह सोच कि “हमने सहा है, तो वह भी सहे” केवल अन्याय को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाती है। परिवार में सबसे बड़ी जरूरत इस मानसिकता को तोड़ने की है। बहू को अगर हमेशा बाहरी व्यक्ति की तरह देखा जाएगा, उसके हर व्यवहार को शिष्टाचार के कठोर पैमाने पर तौला जाएगा, तो घर कभी सहज नहीं बन पाएगा।
एक सामान्य-सी घटना भी घर के भीतर बड़े तनाव का कारण बन जाती है। मान लीजिए किसी बहू को थकान है, शरीर दर्द कर रहा है, और वह कमरे में या घर के किसी हिस्से में थोड़ी देर लेट जाती है। कई बार इसे शिष्टाचार का प्रश्न बना दिया जाता है, मानो उसका बैठना, उठना, सोना सब किसी परीक्षा का हिस्सा हो। लेकिन सवाल यह है कि जो बात बेटी के लिए सामान्य है, वही बहू के लिए अस्वीकार्य क्यों हो जाती है? यही वह अंतर है जिसे मिटाने की जरूरत है। अगर बेटी थक जाए तो उसे आराम दिया जाता है, बहू थक जाए तो उसे ताने क्यों मिलते हैं? घर की समरसता की शुरुआत यहीं से होती है कि बहू को भी बेटी की तरह मनुष्य माना जाए—एक ऐसा व्यक्ति, जिसे शरीर की थकान होती है, जिसकी सीमाएँ हैं, जिसकी भावनाएँ हैं।
पति की स्थिति भी इन झगड़ों में अक्सर सबसे अधिक दबावपूर्ण होती है। सास-बहू के बीच का तनाव कई बार पति को ऐसी स्थिति में ला देता है जहाँ वह किसी एक पक्ष का समर्थन करे तो दूसरा पक्ष आहत होता है। लेकिन सही दृष्टि यह है कि पति को पक्ष नहीं, न्याय देखना चाहिए। पत्नी से मानसिक मेल कितना है या नहीं है, यह अलग बात हो सकती है; किन्तु सही और गलत को पहचानने की क्षमता हर व्यक्ति में होनी चाहिए। किसी संबंध में भावनात्मक दूरी हो सकती है, पर इससे अन्याय को न्याय नहीं कहा जा सकता।
यहीं से विवाह की बड़ी बहस शुरू होती है। आज विवाहों का टूटना, तलाक का बढ़ना और रिश्तों में जल्दी ऊब पैदा होना समाज के सामने गंभीर प्रश्न है। इसका एक कारण यह भी माना जा सकता है कि विवाह को अक्सर केवल सामाजिक संस्था समझा जाता है, जबकि वह दो व्यक्तियों की साझेदारी भी है। यदि साझेदारी केवल आकर्षण, सुविधा या सामाजिक दबाव पर खड़ी हो, तो समय के साथ उसमें नीरसता आ सकती है। कम उम्र में हुए विवाहों में कई बार दोनों व्यक्ति एक-दूसरे से बहुत कुछ सीखते हैं, एक-दूसरे के गुणों को अपना लेते हैं, पर जैसे-जैसे व्यक्तिगत विकास होता है, रिश्ते में नया अर्थ खोजने की चुनौती भी सामने आती है। यदि मानसिक स्तर पर जुड़ाव नहीं है, तो रिश्ता केवल औपचारिकता में बदल सकता है।
यही कारण है कि विवाह के भीतर प्रेम और आकर्षण के अंतर को समझना आवश्यक है। आकर्षण क्षणिक हो सकता है; प्रेम गहरा, शांत और दीर्घजीवी होता है। आकर्षण देह, आदत, व्यक्तित्व या किसी विशेष गुण से जन्म ले सकता है; लेकिन प्रेम मन के स्तर पर समझ, स्वीकार और आत्मिक निकटता से पैदा होता है। प्रेम वहाँ है जहाँ सामने वाला बिना कहे समझ में आने लगे, जहाँ उसकी खुशी में अपनी खुशी दिखने लगे, जहाँ उसे नियंत्रित करने के बजाय उसके विकास की इच्छा उत्पन्न हो। प्रेम अपेक्षा से मुक्त होने की दिशा में ले जाता है, जबकि मोह और अधिकार सामने वाले को बाँधना चाहते हैं।
समस्या यह है कि समाज में प्रेम, वासना, आकर्षण, करुणा और संबंधों के अन्य रूपों के बीच का अंतर बहुत कम समझा जाता है। इसी वजह से विवाह के भीतर भी भ्रम पैदा होता है। बहुत से लोग प्रेम को केवल शारीरिक संबंध से जोड़कर देखते हैं, जबकि गहरे अर्थ में प्रेम मानसिक और आत्मिक संवाद से भी जन्म लेता है। दो लोग घंटों बात करें, एक-दूसरे को समझें, एक-दूसरे की आंतरिक भाषा को पकड़ लें, एक-दूसरे को ऊपर उठाना चाहें—यह भी संबंध का एक गंभीर रूप है। जहाँ मानसिक निकटता होती है, वहाँ रिश्ता केवल बाहरी ढाँचे तक सीमित नहीं रहता।
विवाह टूटने का एक और कारण यह भी है कि लोग संबंधों में स्थिरता और निरंतरता की साधना कम करते जा रहे हैं। जीवन में किसी एक व्यक्ति, एक विचार, एक ग्रंथ या एक साधना के प्रति दीर्घकालिक समर्पण दुर्लभ होता जा रहा है। जबकि प्रेम की एक पहचान निरंतरता भी है। जो व्यक्ति किसी एक संबंध को बार-बार समझने, पढ़ने, संभालने और उसमें उतरने की क्षमता रखता है, वही प्रेम के गहरे अर्थ को छू सकता है। वरना रिश्ते उपभोग की वस्तु बन जाते हैं—जब तक नया लगे, तब तक ठीक; जब कठिन हो जाए, तो उससे बाहर निकलने की बेचैनी शुरू।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर विवाह हर हाल में बचाया ही जाए। जहाँ हिंसा है, अपमान है, मानसिक प्रताड़ना है, वहाँ अलग होना भी कई बार उचित और नैतिक निर्णय हो सकता है। एक-दूसरे की हत्या कर देने, जीवन नष्ट कर देने या निरंतर विषाक्त वातावरण में जीने से अच्छा है कि व्यक्ति गरिमा के साथ अलग रास्ता चुनें। तलाक हर बार विफलता नहीं होता; कई बार वह अन्यायपूर्ण संबंध से मुक्ति भी हो सकता है। लेकिन तलाक की बढ़ती प्रवृत्ति का चिंतन करते समय यह समझना होगा कि क्या हम रिश्ते की तैयारी कर रहे हैं, या केवल विवाह की रस्म पूरी कर रहे हैं।
परिवार में समरसता लाने के लिए सबसे पहला कदम है—भेद मिटाना। बहू और बेटी के बीच, अपने और पराए के बीच, अधिकार और करुणा के बीच, शिष्टाचार और संवेदना के बीच। अगर घर में स्त्रियाँ ही दूसरी स्त्री को स्वीकार नहीं करेंगी, तो फिर न्याय की शुरुआत कहाँ से होगी? सास यदि बहू को बेटी की तरह देखने लगे, और बहू भी घर को युद्धभूमि नहीं, संबंधों का साझा स्थान माने, तो बहुत से संघर्ष स्वतः कम हो सकते हैं।
दूसरा कदम है—संवाद। पति-पत्नी के बीच, माँ-बेटे के बीच, सास-बहू के बीच, सबके बीच। संवादहीनता किसी भी घर की सबसे बड़ी बीमारी है। जब लोग अपनी पीड़ा, अपनी अपेक्षा, अपने असंतोष और अपनी थकान को शब्द नहीं दे पाते, तब वही बातें तानों, कटाक्षों और झगड़ों में बदल जाती हैं।
तीसरा कदम है—प्रेम की पुनर्परिभाषा। प्रेम अधिकार नहीं, स्वीकार है। प्रेम नियंत्रण नहीं, सहयोग है। प्रेम केवल देह का विषय नहीं, मन और दृष्टि का विस्तार भी है। यदि परिवार प्रेम के इसी व्यापक रूप को समझ ले, तो विवाह बोझ नहीं रहेगा, बहू प्रतिस्पर्धी नहीं लगेगी, सास शत्रु नहीं दिखेगी, और पति दो पाटों में पिसता हुआ व्यक्ति नहीं रहेगा।
समाज को आज सबसे अधिक इसी बात की जरूरत है कि वह रिश्तों को नियमों से नहीं, संवेदना से पढ़े। शिष्टाचार जरूरी है, लेकिन उससे बड़ा मनुष्य का सम्मान है। परंपरा महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे बड़ी करुणा है। और विवाह आवश्यक संस्था है, लेकिन उससे भी बड़ा सत्य है—दो व्यक्तियों की गरिमा, स्वतंत्रता और मानसिक शांति।
परिवार तभी बचेगा जब उसमें प्रेम होगा, और प्रेम तभी बचेगा जब उसमें समानता, संवाद और संवेदना होगी। वरना घर भले खड़ा रहे, रिश्ते भीतर से ढहते रहेंगे।
