संसद के मानसून सत्र के सत्रावसान में हो रही देरी को लेकर कांग्रेस ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला है।
कांग्रेस महासचिव और संचार प्रभारी जयराम रमेश ने शुक्रवार, 11 सितंबर 2026 को कहा कि संसद को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जाने और उसके औपचारिक सत्रावसान के बीच का अंतर 29 दिन हो चुका है।
कांग्रेस का दावा है कि यह 2015 में बने 28 दिनों के रिकॉर्ड से भी अधिक है।
क्या है पूरा मामला?
संसद का मानसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किया जा चुका है, लेकिन उसका औपचारिक सत्रावसान अभी नहीं हुआ है।
जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर कहा कि:
👉 2026 के मानसून सत्र में स्थगन और सत्रावसान के बीच का अंतर 29 दिन हो चुका है।
उनके मुताबिक सामान्य तौर पर यह अंतर लगभग तीन से चार दिन का होता है।
कांग्रेस का कहना है कि 2015 में भी संसद के मानसून सत्र के मामले में यह अंतर 28 दिनों तक पहुंचा था, लेकिन इस बार सरकार ने अपना ही रिकॉर्ड पीछे छोड़ दिया है।
कांग्रेस ने अमित शाह पर क्या आरोप लगाया?
जयराम रमेश ने इस देरी को सीधे परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक से जोड़ते हुए गृह मंत्री अमित शाह पर गंभीर राजनीतिक आरोप लगाए हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार लोकसभा में विधेयक को पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिश कर रही है।
रमेश ने दावा किया कि 17 अप्रैल 2026 को विधेयक के खिलाफ मतदान करने वाले तीन राजनीतिक दलों में विभाजन कराया गया है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि दूसरे दलों को अपना रुख बदलने के लिए:
👉 दबाव
👉 धमकी
👉 और प्रलोभन
का इस्तेमाल किया जा रहा है।
हालांकि, ये कांग्रेस और जयराम रमेश के आरोप हैं। उपलब्ध सामग्री में केंद्र सरकार या गृह मंत्री अमित शाह की ओर से इन आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई है।
17 अप्रैल को लोकसभा में क्या हुआ था?
परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक पर 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में मतदान हुआ था।
कुल 528 सांसदों ने मतदान किया।
इनमें:
- 298 सांसदों ने विधेयक के पक्ष में वोट दिया
- 230 सांसदों ने विरोध में वोट दिया
- दो-तिहाई बहुमत के लिए 352 वोट जरूरी थे
यानी विधेयक के समर्थन में 298 वोट पड़े, लेकिन आवश्यक 352 वोट का आंकड़ा हासिल नहीं हो सका।
यह विधेयक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिला आरक्षण के कार्यान्वयन से जुड़े परिसीमन प्रावधानों से संबंधित था।
कांग्रेस क्यों मांग रही है सर्वदलीय बैठक?
जयराम रमेश ने सरकार से परिसीमन के प्रस्तावों पर चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है।
कांग्रेस का कहना है कि परिसीमन का सवाल देश के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और भारतीय गणराज्य की बुनियादी व्यवस्था से जुड़ा हुआ है।
इसलिए इस विषय पर:
👉 व्यापक राजनीतिक चर्चा
👉 सभी दलों की भागीदारी
👉 और व्यापक सहमति
की जरूरत है।
जयराम रमेश ने सवाल उठाया कि सरकार परिसीमन को लेकर अपने प्रस्तावों पर विपक्षी दलों के साथ खुलकर चर्चा क्यों नहीं कर रही है।
सत्रावसान को लेकर कांग्रेस का सवाल
कांग्रेस लगातार यह सवाल उठा रही है कि मानसून सत्र को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने के बाद उसका औपचारिक सत्रावसान अब तक क्यों नहीं किया गया।
जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि सरकार सत्रावसान में देरी के जरिए विपक्ष पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश कर रही है।
उन्होंने यह भी कहा कि सरकार जब चाहे, किसी भी उद्देश्य के लिए संसद का नया सत्र बुला सकती है।
यानी कांग्रेस के मुताबिक सत्रावसान में देरी का कोई स्पष्ट संसदीय लाभ नहीं है, लेकिन इसके पीछे राजनीतिक रणनीति जरूर हो सकती है।
विश्लेषण: संसद की प्रक्रिया के पीछे परिसीमन की बड़ी राजनीति
इस पूरे विवाद को केवल संसद के सत्रावसान में देरी के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं होगा।
इसके पीछे परिसीमन और लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक के लिए जरूरी संख्या का सवाल भी जुड़ा हुआ है।
1. 352 वोट का आंकड़ा सबसे महत्वपूर्ण
17 अप्रैल का मतदान सरकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक आंकड़ा है।
528 सांसदों के मतदान में विधेयक को 298 वोट मिले थे, जबकि दो-तिहाई बहुमत के लिए 352 वोट चाहिए थे।
👉 यानी आवश्यक बहुमत और मिले समर्थन के बीच 54 वोट का अंतर था।
अगर विधेयक भविष्य में फिर लोकसभा में आता है, तो यही संख्या सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी।
2. परिसीमन सिर्फ सीटों का सवाल नहीं
परिसीमन का संबंध भविष्य में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से है।
इसलिए यह विषय:
👉 राज्यों के प्रतिनिधित्व
👉 राजनीतिक शक्ति के संतुलन
👉 और चुनावी व्यवस्था
पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।
यही वजह है कि कांग्रेस इस मुद्दे पर सर्वदलीय सहमति की मांग कर रही है।
3. आरोप बनाम राजनीतिक वास्तविकता
कांग्रेस ने सत्रावसान में देरी और दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिश के बीच संबंध स्थापित किया है।
लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि देरी का वास्तविक उद्देश्य यही है।
👉 कांग्रेस के आरोप अपनी जगह हैं।
👉 सरकार का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है।
👉 अंतिम तस्वीर सरकार के अगले कदम और संसद में संख्या बल से ही स्पष्ट होगी।
निष्कर्ष: 29 दिन की देरी से बड़ा सवाल परिसीमन पर सहमति का
संसद के सत्रावसान में 29 दिनों की देरी अब राजनीतिक बहस का विषय बन चुकी है।
कांग्रेस इसे सरकार की रणनीति से जोड़ रही है और आरोप लगा रही है कि परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिश की जा रही है।
लेकिन इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 17 अप्रैल को विधेयक को 298 वोट मिले थे, जबकि दो-तिहाई बहुमत के लिए 352 वोट जरूरी थे।
अब आगे नजर रहेगी:
- संसद का औपचारिक सत्रावसान कब होता है?
- क्या सरकार परिसीमन पर सर्वदलीय बैठक बुलाती है?
- क्या परिसीमन विधेयक को फिर लोकसभा में लाया जाता है?
- और अगर विधेयक आता है, तो क्या सरकार 352 का आंकड़ा पार कर पाएगी?
फिलहाल संसद का सत्र भले स्थगित हो चुका हो, लेकिन परिसीमन को लेकर राजनीतिक बहस अभी खत्म नहीं हुई है।
